Sunday, 11 November 2018

मुहब्बत जैसा गुनाह किया...

कैसे कहूं कि
हां !कसुरवार हूं ,
मुहब्बत जैसा गुनाह किया
जो था दिल के सबसे करीब,
उस दोस्त की दोस्ती को रुसवा किया,
जिससे थे शब्दों के रिश्ते
उसे दिल से बया किया,
तोड़ा है दिल सबका
कुछ के विश्वास,
कुछ की उम्मीदें,
और मां -बाप के सपनो को फना किया।
पर सोचा ना किसी ने
की दिल मेरा भी तो टूटा है,
खोया है हमने भी  सबकुछ
सपना मेरा भी तो टूटा है।
सबको मिला है विष
अपमान का,
जो घुट घुटकर पीना है
हमको भी मिली है जिन्दगी
अपमान की
जो टूटे,बिखरे  रिश्तों की कांच पर
चलकर ,
हमको ये जीवन जीना है।।

-अरबिन्द "अश्क"
११नवम्बर २०१८