मुहब्बत की वादियां
न जाने कहां ले जाएंगी
अभी तो है ऊंचे
दिल के अरमान,
पहाड़ो से गीरते झरनो से
दिल में एक हलचल सी होती है
पंछीयो का यूँ चहचहाना
मस्ती में बहती हवाओं का
मधुरगीत गुनगुनाना
खो सा जाता हूं
वादियों के हसीन एहसास में
तभी बादलों की गड़गड़ाहट से
कल की कठीनाईयो का एहसास हो जाता है
पर राह जो पकड़ी उसपे चलना तो होगा
ठोकरों से गिरके फिर से सम्भलना तो होगा।
-अरबिन्द 'अश्क़'
08 जन.17