Wednesday, 30 September 2015

आकांक्षाओं के पर

 आकांक्षाओं के पर ....

आकांक्षाओं के पर 
नाउम्मिदियों का भार 
लबों पे झूठी हंसी 
किस्मत की खुद से तकरार 
चल रही है जिंदगी 
थोड़ी हस के 
थोड़ी रो के 
पाया है कुछ ....
बहुत कुछ खो के 
दर्द का हर लम्हा 
बीत जाता है 
शायद आने वाला पल मेरा हो 
बस यही सोच के 
ठाठस दिलाता 
खुद से रूठता 
कभी खुद को मनाता 
जिंदगी के हर इम्तेहा समझता
कभी जिंदगी के सवालो में 
खुद उलझ जाता 
गिरता संभलता
खुद की पीठ थपथपाता 
लबों पे एक हसी ला 
खुद से ही ये सवाल पूछ 
खुद ही जवाब बनाता
जिंदगी दर्द सही 
पर खुशियों का मजा 
दर्द को याद करके ही आता...
              Arbind "Anj"
              07/08/15

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