Friday, 21 June 2019

उम्मीदों की दीवार

कह दो उनसे मेरी उम्मीदों की दीवार अब टूटने को है
अब लूटनेवाले हर ईंट लूट जायेंगे,
गुनाह बस इतना था मेरा,
गैरों की एकाद ईंट को अपना समझ बैठा था
अब आये अपनी ईंट पहचान
वापस ले जाये
सब कुछ बिखर गया मेरा
बस ढ़ेर है ख्वाहिसो का
कह दो जयचंदो से
बुला लें मुहम्मद गौरी
चौहान निहत्था खड़ा है।।
21June 19

Sunday, 11 November 2018

मुहब्बत जैसा गुनाह किया...

कैसे कहूं कि
हां !कसुरवार हूं ,
मुहब्बत जैसा गुनाह किया
जो था दिल के सबसे करीब,
उस दोस्त की दोस्ती को रुसवा किया,
जिससे थे शब्दों के रिश्ते
उसे दिल से बया किया,
तोड़ा है दिल सबका
कुछ के विश्वास,
कुछ की उम्मीदें,
और मां -बाप के सपनो को फना किया।
पर सोचा ना किसी ने
की दिल मेरा भी तो टूटा है,
खोया है हमने भी  सबकुछ
सपना मेरा भी तो टूटा है।
सबको मिला है विष
अपमान का,
जो घुट घुटकर पीना है
हमको भी मिली है जिन्दगी
अपमान की
जो टूटे,बिखरे  रिश्तों की कांच पर
चलकर ,
हमको ये जीवन जीना है।।

-अरबिन्द "अश्क"
११नवम्बर २०१८

Sunday, 28 August 2016

वफ़ा की आदत

हमें ना मालूम
वफ़ा की आदत
हमें किस मंजिल को मिलायेगी,
अभी है रंगो से भरी
ये जिंदगी मेरी
हम है और उनका प्यार ,
बस सोचके सहम जाता हूँ
कल ना जाने कब वो हमसे दूर हो जायेगी ,
ऐसा भी नहीं की बिन लड़े हारने वाला मैं
पर उसकी जुदाई
कही रोक ना ले सांसे हमारी,
मानता हूँ मै सच्चा ना सही
पर मेरा प्यार सच्चा है और हरदम रहेगा।

-Arbind "Ashq"
   28 August 16

Friday, 9 October 2015

मुहब्बत की वादियां


मुहब्बत की वादियां
न जाने कहां ले जाएंगी
अभी तो है ऊंचे
दिल के अरमान,
पहाड़ो से गीरते झरनो से
दिल में एक हलचल सी होती है
पंछीयो का यूँ चहचहाना
मस्ती में बहती हवाओं का
मधुरगीत गुनगुनाना
खो सा जाता हूं
वादियों के हसीन एहसास में
तभी बादलों की गड़गड़ाहट से
कल की कठीनाईयो का एहसास हो जाता है
पर राह जो पकड़ी उसपे चलना तो होगा
ठोकरों से गिरके फिर से सम्भलना तो होगा।

       -अरबिन्द 'अश्क़'
             08 जन.17

Wednesday, 30 September 2015

आकांक्षाओं के पर

 आकांक्षाओं के पर ....

आकांक्षाओं के पर 
नाउम्मिदियों का भार 
लबों पे झूठी हंसी 
किस्मत की खुद से तकरार 
चल रही है जिंदगी 
थोड़ी हस के 
थोड़ी रो के 
पाया है कुछ ....
बहुत कुछ खो के 
दर्द का हर लम्हा 
बीत जाता है 
शायद आने वाला पल मेरा हो 
बस यही सोच के 
ठाठस दिलाता 
खुद से रूठता 
कभी खुद को मनाता 
जिंदगी के हर इम्तेहा समझता
कभी जिंदगी के सवालो में 
खुद उलझ जाता 
गिरता संभलता
खुद की पीठ थपथपाता 
लबों पे एक हसी ला 
खुद से ही ये सवाल पूछ 
खुद ही जवाब बनाता
जिंदगी दर्द सही 
पर खुशियों का मजा 
दर्द को याद करके ही आता...
              Arbind "Anj"
              07/08/15

Wednesday, 22 April 2015

हम इश्क का

हम इश्क का
हर इम्तिहान देगे

जो होगा मेरा रकीब
उसे भी दुवा देगे

पर दूर नहीं रह सकता
अपनी मुहब्बत से

हम काँटों पे भी चलेगे
लबो पे हंसी सजाके

पर हुवा जो वो दूर मुझसे

उसी वक़्त हम खुद को
मिटा देगे .
         -अरबिन्द "अंज "

हर मुस्कुराहट

हर मुस्कुराहट
अब तो वीरान हो गयी
जिंदगी हमारी
बदनाम हो गयी
फूलो को छोड़ के
कर गया मुहब्बत कांटो से
काँटों से किसी को मिली
कहां मुहब्बत
अब तो उल्फत हमारी
सरेआम हो गयी
चुभती रही सारी उम्र
उसकी बेवफाई
वफ़ा कि उम्मीद में
सुबह से शाम हो गयी .
        -अरबिन्द "अश्क "
         01 March 2010

वही दे गए आँखों में आंसू

क्या करते एतवार
हम दुनियां कि यारो ,
जिसे दिल से चाहा
वही दे गए आँखों में आंसू
हंसी जिसको दी
ख़ुशी जिसको दी
वही दे गए आँखों में आंसू
यूँ तनहा ही जी लेते तो अच्छा  होता
संग जीने मरने किजिसने कसम थी खाई
वही दे गए आँखों में आंसू
है कितना खुदगर्ज
ये जमाना
देते थे जिसका साथ तन्हाई में
वही दे गए आँखों में आंसू
काश संभल जाता
ये पागल दिल हमारा
ना करता जुस्तजू किसी का
तो ना होता घायल दिल हमारा
टूटती ना हसरत
ना बहते इन आँखों से आंसू ....
        -अरबिन्द "अश्क "
          १७ जनवरी २०१०

ऐ जिंदगी !

है रंग अनोखे तेरे
ऐ जिंदगी !
तू हंसाये भी
रुलाये भी
होके शोख चंचल
हंसी बनके आती है लबो पे
तो कभी खोमोशी
ऐ जिंदगी !
तू अपनाये भी
ठुकराए भी
पलभर में मिल जाये
दुनियां कि सारी ख़ुशी
तो पल भर में सरे ग़म
ऐ जिन्दगी !
तू जलाये भी
बुझाये भी
ना किसी का जोर
चलता है तुझ पे
तू अपनी मर्जी से
आये भी
जाये भी
है रंग अनोखे तेरे
ऐ जिन्दगी !
तू हंसाये भी
रुलाये भी .
-अरबिन्द "अश्क "
19 january 2010

सताती है जिंदगी

सताती है जिंदगी
सताते है लोग,
हंसाती है जिंदगी
तो सुर मिलाते है लोग,
बड़ी खुदगर्ज है ये दुनियां
दौलत पे बिकते है रिश्ते,
कही दौलत से दोस्त
तो कही हमराही भी बन जाते है लोग ,
ना हो दौलत तो बेकार है रिश्ते
बिन दौलत के बने रिश्ते भी
तोड़ जाते है लोग .
 
                -अरबिन्द "अश्क"
                   22 अप्रैल 2015

Tuesday, 2 December 2014

दिल ने जो चाहा..

दिल ने जो  चाहा 
वो मिला ना कभी,
जिसका डर था 
वही मिलता रहा,
हसरत थी की
चाहे कोई मुझे भी टूट के ,
पर तनहा तनहइयो 
में घुटता रहा,
जब रूठी हो किस्मत 
तो गैरों से कैसा शिकवा,
जमाने के बिछाये हर काँटों  पे 
आंखे मूंद चलता  रहा,
अब तो जैसे भी हो
जिते है हम,
मालूम है कि ज़हर है उसके बिन ज़िन्दगी 
फिर भी ज़हर घुट  के पीते है हम.
                        - अरबिन्द "अश्क "
                              जून २०१० 

Friday, 22 March 2013

खुले आसमां मे..


 




खुले आसमां मे चमकने को 
तारें हजारो है ,

पर चाँद बिन सजती नहीं महफ़िल
सोती है दुनियां 

जब सुख की गहरी नीद में 
तनहइयो मे टूट के रोता है
मेरा दिल 




है किसकी कमी मालूम नहीं 


है कैसी खलिस मालूम नहीं 


है बस वीरानियो का बसेरा 





किससे करू हाले दिल बयान 


मतलबी दुनियां मे 


हम शायद किसी के काबिल नहीं...


                      -Arbind "ashq"

आसां क्यों नहीं ???


दर्दो को बया करना 
आसां क्यों  नहीं???
घुट-घुट कर जीना 
क्या यही जिंदगी है ???
रोता है दिल 
आंसुओ की आड़ में 
पर जिंदगी है की इम्तेहां का 
शैलाब लिये है 
फिरता हूँ  मारा -मारा 
चैनो शुकुन  की फिराक मे 
की कही तो जिंदगी को जिंदगी मिले ...
वक्त यूं ही गुजरता चला जा रहा 
और हम तन्हाइयों में खुद को 
मिटा रहे ....
हसरत तो कबकी खाक हो गयी ...
बस यादों का राख 
सिने पर पोत रखा  है.
               -अरबिंद "अश्क "

Saturday, 22 December 2012

क्या पता कल हम ना होगें


 क्या पता कल हम ना होगें 

जी भर के सता लो 
ऐ दुनियांवालो 
क्या पता कल हम ना होगे ,
हवाएँ तो यही चलेगी 
पर शायद ऐसे मौसम ना होगे ,
रुलाते हो हमे 
तनहा समझ के 
पर कल तुम भी रोवोगे ,
जब रुलाने की खातिर हम ना होगे. 
माना की है ये जन्नत तुम्हारे ,
ये चाँद तुम्हारे, 
ये पारीयां तुम्हारी ...
पर गुनगुनावोगे मुझे भी कभी 
पास तुम्हारे जब हम ना होगें 
ये कैसी बेरुखी है हमसे ..
ऐ दुनियांवालो 
माना की मै कांटा ही सही ,
पर ढूँढोगे कभी ना कभी 
जब चुभेगा खार और 
निकालने की खातिर हम ना होगें ,
जी भर के सता लो 
ऐ दुनियांवालो 
क्या पता कल हम ना होगे ....
    ARBIND "ASHQ"

Friday, 21 December 2012

माँ तू कितना याद आती है .....

"ARBIND ASHQ"
 माँ तू कितना याद आती है

माँ तू कितना याद आती है 
जब दुनिंया के भीड़ से तनहा होता हूँ ...
जब अकेली रात में 
डर के सोता हूँ ...
माँ तू कितना याद आती है... 
जब कभी दिन भर की भाग दौड से थक के 
सोता हूँ 
जब कभी अपनी तन्हाईयों पे तनहा रोता हूँ
माँ तू कितना याद आती है... 
दुनियां के प्यार मुहब्बत के खेलो से 
जब दिल टूट जाता है 
दोस्ती के झमेलो से 
जब हर कोई पराया लगता है 
माँ तू कितना याद आती है...
                  -"ARBIND ASHQ"

Sunday, 4 November 2012

तनहा जीने की .....

तनहा जीने की हसरत

तनहा जीने की हसरत
किसे होती है,
दोस्ती गमों से
दुश्मनी खुशियों से किसे होती है,
ये तो वक्त है जो देता है
सितम दर सितम
वरना
आंसू पीने की हसरत
किसे होती है ,
लाख मुद्दई सताये हमे
तो क्या
हम टकरायेगे यू ही
क्यों की
जब तक हो उम्मीद की एक किरण
तब तक
ना उम्मीदी की
रात नहीं होती ....

Monday, 18 June 2012

मुहब्बत काँटों से







 हर मुस्कुराहट
अब तो वीरान हो गई,
जिंदगी हमारी
 बदनाम हो गई,
फूलों को छोड़के
कर गया मुहब्बत काँटों से,
काँटों से किसी को मिली
 कहाँ मुहब्बत,
अब तो उल्फत हमारी
सरेआम हो गई
चुभती रही सारी उम्र
उसकी बेवफ़ाई,
वफ़ा की उम्मीद में
सुबह से शाम हो गई....